Ep. 35: ख़ुफ़िया बातें

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जासूसी एक ऐसा पेशा है जिसके बारे में न सिर्फ हम कम जानते है बल्कि अक़्सर सरासर ग़लत भी जानते है | फिल्मों में इस पेशे को इस तरह दर्शाया जाता है कि इंटेलिजेंस अफ़सर कई दिव्य शक्तियों के मालिक लगने लगते है | तो इस बार की पुलियाबाज़ी एक असली इंटेलिजेंस अफ़सर के साथ इस पेशे के बारे में | हमने बात की भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) के भूतपूर्व प्रमुख विक्रम सूद के साथ | यह चर्चा सूद जी की बेहतरीन किताब ‘The Unending Game: A Former R&AW Chief’s Insights into Espionage’ पर आधारित है | चर्चा में उठे कुछ सवाल:

  1. इंटेलिजेंस एजेंसी चार प्रकार के काम करती है - collection, analysis, dissemination, और operation| इन चारों को करने के लिए क्या ख़ूबियाँ चाहिए एक अफ़सर में?

  2. एक ख़ुफ़िया(covert) ऑपरेशन का मतलब क्या होता है? स्पेशल ऑपरेशन क्या होता है?

  3. भारत में ही नहीं पर पूरे विश्व में TECHINT की एक लहर आयी थी लेकिन अब CIA भी
    मानती है कि HUMINT को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता भले ही टेक्नोलॉजी कितनी ही अच्छी क्यों न हो जाए| ऐसा क्यों?

4."इंटेलिजेंस failure" होता क्या है?

  1. आज ख़ुफ़िया एजेंसियों का ध्यान आतंकवाद पर केंद्रित रहता है | इसका एक इंटेलिजेंस एजेंसी पर क्या असर पड़ता है?

  2. ३० साल बाद की इंटेलिजेंस एजेंसी को क्या क्या करना होगा?

  3. इंटेलिजेंस एजेंसियों में सुधार कहाँ से शुरू किया जाए?

Intelligence is one of the oldest professions known. Even the Arthashastra describes in detail the various methods of using spying as a tool of statecraft. And yet, enamoured by glorified portrayals of intelligence agencies on-screen, our knowledge about this discipline has many gaps. So in this episode we spoke to Mr Vikram Sood about the state of the profession today and the challenges faced by intelligence officers. Mr Sood headed India’s premier intelligence agency R&AW between 2000 and 2003. His book The Unending Game: A Former R&AW Chief’s Insights into Espionage is an excellent guide for understanding intelligence and espionage. During the course of this conversation, we discussed:

  1. How does the working of an external intelligence agency differ from that of an internal security service like IB, MI5 etc?

  2. What does the term ‘covert operation’ mean? How is a special operation different from a covert one?

  3. How important is the human element in the intelligence cycle? Can technology replace humans here?

  4. What is meant by an intelligence failure?

  5. What should be the essential elements of reforming intelligence agencies?

Listen in!

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Ep. 34: हमारी राजनीति आख़िर ऐसी क्यों है?

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2019 मतदान क़रीब है और राजनीति की हवा किस दिशा में बह रही है, इस पर हर भारतीय का अपना एक मत तो ज़रूर है| अक़्सर लोग कहते हैं कि भारत में राजनीति विचारधाराओं से परे है ; वह केवल नेताओं के व्यक्तित्व, भ्रष्टाचार, या फ़िर जातिगत समीकरण पर केंद्रित है | पर इन आम धारणाओं में कितना सच है, इसी विषय पर इस हफ़्ते की पुलियाबाज़ी राहुल वर्मा (फेलो, राहुल सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च) के साथ| राहुल और प्रदीप छिब्बर की नई किताब Ideology & Identity: The Changing Party Systems of India भारतीय राजनीति की संरचना पर एक गहन अध्ययन है |

राहुल से हमने इन सवालों पर पुलियाबाज़ी की:

भारतीय राजनीति की विचारधारा के स्तंभ क्या है?
स्वतंत्र होने से पहले क्या सोच थी सरकार के समाज में रोल के बारे में ? स्वतंत्र भारत में क्या कहानी रही है?
क्या वोट खरीदने से ही सरकारें बन जाती हैं?
क्या जाति सबसे बड़ा फैक्टर है हमारी राजनीति में?
नेताओं के व्यक्तित्व का क्या असर होता है वोटर पर?
एक और मान्यता है कि काडर (संगठन) वाली पार्टिया सफल होती है | कितना सच है इसमें?
२०१४ में जो नतीजा आया वह क्यों आया?

The 2019 elections are around the corner. Instead of adding to the chatter on electoral predictions, we present an in-depth chat with Rahul Verma (Fellow, Centre for Policy Research) on the structure of Indian politics. Rahul is the co-author of Ideology & Identity: The Changing Party Systems of India, a book that challenges common assumptions that Indian polity is chaotic, clientelistic, corrupt, and devoid of any ideology. Instead, they claim that the most important ideological debates in India are centred on statism-the extent to which the state should dominate and regulate society-and recognition-whether and how the state should accommodate various marginalised groups and protect minority rights from majorities.

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Ep. 31: स्वतंत्र भारत में मतदान की कहानियाँ

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2019 के लोकसभा चुनाव नज़दीक आ रहे है | अगले कुछ महीनों में हर नुक्कड़-गली में “कौन बनेगा प्रधानमंत्री” इसी विषय पर वाद-विवाद होगा | तो पुलियाबाज़ी में हमने इस प्रश्न से हटकर मतदान प्रक्रिया को समझने का प्रयास किया | इस पुलियाबाज़ी में हमारे गेस्ट है श्री अलोक शुक्ला जो २००९ और २०१४ के बीच भारत के डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर रह चुके हैं | उनकी नयी किताब Electronic Voting Machines: The True Story इवीएम पर लग रही आलोचनाओं का मुँहतोड़ जवाब देती है | इस पुलियाबाज़ी में हमने उनके सामने यह सवाल रखे:

  1. संसद चुनाव के लिए प्रक्रिया कब और कैसे शुरू होती है ?

  2. चुनाव आयोग एक स्वतन्त्र संवैधानिक संस्था है - इस संरचना का ECI अफसरों पर आपके मुताबिक क्या फ़र्क पड़ता है? क्या सब पार्टियाँ चुनाव आयोग के पास चुगली करने आती रहती है?

  3. EVM के आने से पहले क्या तकलीफें होती थी चुनाव करवाने में ?

  4. EVM का आईडिया कब पहले आया? क्या क्या विरोध रहे है EVM के ख़िलाफ़?

  5. EVM और राजनैतिक दलों का रिश्ता कैसा रहा है?

  6. EVM की छवि सुधारने के लिए ECI को क्या करना चाहिए?

In the 1971 General Elections, it was alleged that ballot papers were tampered using vanishing and reappearing ink such that the vote stamp miraculously disappeared from another candidate and reappeared against the Congress candidate instead. This is not different from today when political parties blame the Electronic Voting Machine for their losses. So in this episode, we investigate the Indian electoral process and the EVM itself. To help us understand this better, we are joined by Dr Alok Shukla who served as Deputy Election Commissioner between 2009 and 2014. Dr Shukla has served as an international observer for elections in several countries and has been decorated with the Prime Minister’s Award for Excellence in Administration in 2010. His latest book Electronic Voting Machines: The True Story is an authoritative account on electronic voting machines.

सुनिए और बताइये कैसा लगा यह एपिसोड आपको और निश्चिंत होकर अपने उम्मीदवार को चुनिए २०१९ लोकसभा मतदान में |

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Ep. 30: लश्कर-ए-तय्यबा: कब, क्यूँ, और कैसे

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26 नवंबर 2008 , मुंबई की दर्दनाक तस्वीरें आज भी दिल दहला देती हैं | इस हमले को अंजाम दिया था पाकिस्तान सेना के पसंदीदा आतंकवादी गुट - लश्कर-ए-तैयबा ने | इस हादसे के 11 साल बाद भी, हम कम ही जानते है कि यह संगठन शुरू कैसे हुआ, किस मक़सद से हुआ, और इसके हथकंडे क्या है | तो हमने की पुलियाबाज़ी प्रॉफ़ेसर क्रिस्टीन फेयर से, जिन्होंने हाल ही में इस संगठन पर एक किताब ‘In Their Own Words: Understanding the Lashkar-e-Tayyaba’ लिखी है | फेयर जार्जटाउन यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रॉफेसर है और पाकिस्तान सेना पर किये गए अपने उल्लेखनीय शोधकार्य के लिए जानी जाती है | उनसे हमने इस आतंकवादी गुट एक संगठन के रूप में समझने के लिए यह सवाल सामने रखे:

In this episode, we explore one of the most important nodes of the Pakistani military-jihadi complex: the Lashkar-e-Tayyaba (LeT). Our guest for this episode is Prof Christine Fair, a renowned voice on Pakistan security issues. In her latest book In Their Own Words: Understanding the Lashkar-e-Tayyaba, Dr Fair reveals finer details about LeT using publications produced and disseminated by Dar-ul-Andlus, the publishing wing of LeT.

In this Puliyabaazi, we investigate LeT using organisation theory. What are their vision and mission statements? What keeps them together? How do they recruit employees? Who are their shareholders? And finally, what will it take to end this organisation? Listen in for an in-depth discussion on these questions.

सुनिए और बताइये कैसा लगा यह एपिसोड आपको |

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Ep. 29: अम्बेडकर के जातिप्रथा पर विचार: भाग २

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पूरे भारत ने अपना सत्तरवाँ गणतंत्र दिवस पिछले हफ़्ते मनाया और अंबेडकर के योगदान को फिर एक बार याद किया | पर अंबेडकर साहब जैसे बुद्धिजीवी को सम्मान देने का शायद सबसे प्रभावशाली तरीका है उनके विचारों को समझना | अब उनको पुलियाबाज़ी में ला पाना तो संभव नहीं है इसलिए इस बार हमने प्रयत्न किया उनके कुछ लेख पढ़ने का और उनके तर्क को आपके सामने रखने का | इस दो भाग स्पेशल में हमने विश्लेषण किया अंबेडकर के जातिप्रथा पर कुछ विचारों का |

भाग 2 में में सुनिए चर्चा उनके सबसे प्रसिद्ध लेख - Annihilation of Caste - पर | अंबेडकर ने यह भाषण 1936 में लाहौर के जात-पात तोड़क मंडल के लिए तैयार किया था पर यह लेख इतना धमाकेदार था कि मंडल ने इसे प्रकाशित करने से मना कर दिया | अंत में अंबेडकर ने खुद इसे प्रकाशित किया | जातिप्रथा का उन्मूलन क्यूँ और कैसे किया जाए - यह लेख इन सवालों पर केंद्रित है | यह लेख इतना प्रसिद्ध हुआ कि गांधीजी ने भी इस पर अपने विचार रखे और अपनी असहमति के कारण समझाए | इस एपिसोड में हमने इस बेहद ज़रूरी वाद-विवाद पर चर्चा की है | सुनिए और बताइए कैसा लगा आपको|

साथ ही इस सीरीज़ के भाग १ में हमारी चर्चा सुनिए उनकी किताब The Untouchables पर |

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Ep. 28: अम्बेडकर के जातिप्रथा पर विचार: भाग १

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गणतंत्र दिवस के अवसर पर हम भीमराव अम्बेडकर के योगदान को अक़्सर सलामी देते हैं | पर अम्बेडकर साहब जैसे बुद्धिजीवी को सम्मान देने का शायद सबसे प्रभावशाली तरीका है उनके विचारों को समझना| अब उनको पुलियाबाज़ी में ला पाना तो संभव नहीं है इसलिए इस बार हमने प्रयत्न किया उनके कुछ लेख पढ़ने का और उनके तर्क को आपके सामने रखने का | इस दो भाग स्पेशल में हमने विश्लेषण किया अम्बेडकर के जातिप्रथा पर कुछ विचारों का | भाग १ में सुनिए चर्चा उनकी किताब The Untouchables  पर | भाग २ में सुनिए चर्चा Annihilation of Caste पर | अम्बेडकर के काफ़ी लेख विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर आसानी से उपलब्ध है | पढ़िए और अपने विचार ज़रूर शेयर कीजिये हमारे साथ |

Ep. 27: एक नई विश्व व्यवस्था के लिए भारत कैसे तैयारी करे?

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विश्व व्यवस्था के घटनाक्रम में हाल ही तीव्रता से बदलाव हुए हैं। अमरीका और चीन के बीच में 1971 से शुरू हुआ तालमेल का सिलसिला आज एक शीत युद्ध में तब्दील हो गया है। बदलते समीकरणों के चलते अगले २५ सालों में भारत को क्या कदम उठाने चाहिए, इस विषय पर है हमारी इस हफ़्ते की पुलियाबाज़ी |

इस पुलियाबाज़ी में सौरभ और प्रणय ने इन सवालों पर चर्चा की:

१. “विश्व-व्यवस्था” शब्द का अर्थ क्या है?
२. ऐतिहासिक तौर पर किस प्रकार की विश्व-व्यवस्थाएं रह चुकी है?
३. अमरीका और चीन के मनमुटाव के चलते भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा?
४. विश्व-व्यवस्था में आख़िर बदलाव अब क्यों आ रहा है?
५. क्या चीन अमरीका को विश्व के सबसे ताक़तवर देश के रूप में विस्थापित कर सकता है?

सुनिए और कहिए कैसा लगा आपको @puliyabaazi या फिर puliyabaazi@gmail.com पर।

It’s nearly impossible to read a book on geopolitics today without the mention of the phrase A New World Order. Many claims of this New World Order narrative need deeper investigation, starting from these questions: what constitutes a world order? How was the US able to reach this position of a world leader after the World War II? What are the odds that China will replicate this feat? And finally, in what ways can India shape the world order?

These are the questions we tackle in this week’s episode.

Recommended reading and listening on this topic:
Takshashila Discussion Document on ‘India’s Strategies for a New World Order’
Pranay Kotasthane on ‘Ingredients of a New World Order’
The Pragati Podcast episode on ‘A New Brave World Order’
Opinion piece in Rajasthan Patrika ‘भारत कैसे तैयारी करें नयी विश्व-व्यवस्था से निपटने के लिए’ If you have any comments or questions please write to us at puliyabaazi@gmail.com
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Ep. 26: भाग रॉकेट भाग: भारत के अंतरिक्ष प्रोग्राम की कहानी

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अंतरिक्ष खोजने की चाह हज़ारों साल पुरानी है। लेकिन अंतरिक्ष तक पहुंचने की क्षमता केवल सत्तर साल पुरानी है। और भारत उन चुनिंदा देशों में से है जिसने इस खोज में कई झंडे गाढ़े है। तो इस बार पुलियाबाज़ी में हमने भारत के अंतरिक्ष प्रोग्राम पर खुलकर चर्चा की पवन श्रीनाथ से, जो इस विषय पर काफ़ी सालों से शोधकार्य कर रहे हैं। पवन तक्षशिला संस्थान में फेलो है और थले-हरटे (कन्नड) और प्रगति (अंग्रेज़ी) पॉडकास्ट के होस्ट है। हमने इन सवालों पर बातें की इस एपिसोड में:
1. एक ग़रीब देश के अंतरिक्ष प्रोग्राम को स्थापित करने की सोच कहाँ से शुरू हुई?
2. किस तरह यह प्रोग्राम दिल्ली से दूर कई राज्यों में वितरित रहा।
3. उपग्रह और लॉन्च वेहिकल - इन दोनों घटकों पर इसरो का प्रदर्शन कैसा रहा है ?
4. SpaceX जैसी निजी संस्थाओं ने इसरो के सामने क्या चुनौतियाँ रखी हैं?

सुनिए और बताइये कैसा लगा आपको @puliyabaazi या फिर puliyabaazi@gmail.comपर।

In this episode of Puliyabaazi we take a close look at India's space programme with Pavan Srinath, fellow and faculty at the Takshashila Institution and a host of Thale-Harate and Pragati podcasts.

We discussed the impact that space research has for an aspirational society and why the argument 'poor nations shouldn't spend on luxuries like space exploration’ makes little logical sense. We then move on to discuss the beginnings of India's tryst with space. Pavan then takes us through the two components of the space programme - satellites and launch vehicles. Do let us know in puliyabaazi@gmail.com if you have any thoughts to share.

Ep. 25: परदेसी परदेसी जाना नहीं

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‘मेरे पिया गए रंगून, वहाँ से किया है टेलीफून” याद आया न यह गाना? लेकिन आपने सोचा कि इनके पिया आख़िर क्यों और कैसे रंगून पहुंचे? आम धारणा यह है कि भारत में अक़्सर लोग जिस गाँव में जन्म लेते थे, उसी में पूरा जीवन व्यतीत कर देते थे | लेकिन हमारे इस एपिसोड के सह-पुलियाबाज़ चिन्मय तुम्बे बताते है कि भारत का प्रवास याने कि migration के साथ अटूट रिश्ता है | चिन्मय १० साल से migration पर शोध कर रहे है और उन्होंने अपनी किताब India Moving: A History of Migration में भारतीय समाज और migration के कई अनोखे किस्सों का अध्ययन किया है | आपको ज़रूर मज़ा आएगा यह एपिसोड सुनकर!

Everyone of us has a migration story. And yet the term migrant often becomes problematic. So in this week’s Puliyabaazi, we spoke to Chinmay Tumbe, a scholar of Indian migrations and author of the magisterial India Moving: A History of Migration. We discussed Indian communities that are prolific at migration. We also discussed if there is anything like a ‘good migrant’.

Ep. 24: धरती के बर्फीले छोरों से कहानी Climate Change की

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जलवायु परिवर्तन (climate change) के भीषण प्रभावों पर आंकड़े तो स्पष्ट हैं लेकिन फिर भी हम और हमारी सरकारें इस वैश्विक समस्या को गंभीरता से नहीं ले रहे | तो इस पुलियाबाज़ी में हमने सीधे बात की ऐसे क्लाइमेट सेनानी से जो क्लाइमेट चेंज के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए धरती के दोनों बर्फीले ध्रुवों तक ही पहुँच गए | सुनिए हमारी पुलियाबाज़ी राजा कार्तिकेय से जिन्होंने एक साल के भीतर ही अंटार्कटिक और आर्कटिक ध्रुवों का दौरा किया | पेशे से राजा सयुंक्त राष्ट्र में राजनैतिक अफ़सर है और उनकी अपनी कहानी भी बड़ी दिलचस्प है |

उन्होंने समझाया कि आज के क्लाइमेट में बदलाव का कारण भले ही पश्चिमी देश हो पर इसका भारत जैसे देशों पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा | न सिर्फ तटवर्ती इलाक़े बल्कि भारत के अंदरूनी उत्तरी भाग भी इससे बदल जाएंगे | इसीलिए हमारे समाज और सरकारों को इस समस्या का सामना करने की तैयारी आज करनी होगी | तो क्या है वह कदम, जानने के लिए शामिल हो जाइये इस पुलियाबाज़ी में |

Ep. 23: Arthashashtra Part 2: Foreign Policy कैसी होनी चाहिए?

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Real estate से लेकर business advice तक, कौटिल्य नीति को बिना सिर पैर उपयोग करने की होड़ लगी है आजकल | अर्थशास्त्र को ignore करना तो ग़लत है ही, पर उसे ग़लत समझना और भी हानिकारक है | तो कौटिल्य अर्थशास्त्र से जुड़ी कई ग़लतफ़हमियों को ठीक करने के लिए हमने की पुलियाबाज़ी कजरी कमल से जो कि ‘अर्थशास्त्र और Indian Strategic Culture’ पर PhD कर रही हैं हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय से | कजरी तक्षशिला इंस्टीटूशन के Graduate certificate in Strategic Studies में ‘अर्थशास्त्र और भारतीय विदेश नीति’ course पढ़ाती है |

यह पुलियाबाज़ी दो भागों में है | पहले भाग में सुनिए चर्चा अर्थशास्त्र के उद्देश्य और मूलतत्वों पर | दूसरे एपिसोड में सुनिए कि चाणक्य विदेश नीति के बारे में क्या सिखाते है |

Ep. 22: Arthashashtra Part 1: साम, दाम, भेद, दंड से परे

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Real estate से लेकर business advice तक, कौटिल्य नीति को बिना सिर पैर उपयोग करने की होड़ लगी है आजकल | अर्थशास्त्र को ignore करना तो ग़लत है ही, पर उसे ग़लत समझना और भी हानिकारक है | तो कौटिल्य अर्थशास्त्र से जुड़ी कई ग़लतफ़हमियों को ठीक करने के लिए हमने की पुलियाबाज़ी कजरी कमल से जो कि ‘अर्थशास्त्र और Indian Strategic Culture’ पर PhD कर रही हैं हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय से | कजरी तक्षशिला इंस्टीटूशन के Graduate certificate in Strategic Studies में ‘अर्थशास्त्र और भारतीय विदेश नीति’ course पढ़ाती है |

यह पुलियाबाज़ी दो भागों में है | पहले भाग में सुनिए चर्चा अर्थशास्त्र के उद्देश्य और मूलतत्वों पर | दुसरे एपिसोड में सुनिए कि चाणक्य विदेश नीति के बारे में क्या सिखाते है |

Ep. 19: संसद के अंदर

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भारतीय लोकतंत्र में एक सांसद का रोल क्या है? हमारी पार्लियामेंट और राज्य विधान सभाओं को और प्रभावशाली कैसे बनाया जाए? हमें सांसदों के बढ़ते वेतनभत्ते से कितना चिंतित होना चाहिए? इन सब सवालों के दिलचस्प जवाब सुनिए संसदीय मामलों के विशेषज्ञ चक्षु रॉय के साथ चली हमारी पुलियाबाज़ी में। चक्षु PRS Legislative Research संस्था में विधायकी और नागरिक रिश्तों की पहल संभालते है।
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Ep. 18: तूफ़ान-ए-तुर्क में रूपया बेहाल

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आर्थिक जगत में मुद्रा युद्ध की हवा चल रही है | टर्की और अमरीका के बीच शुरू हुई यह आंधी भारत तक पहुँची कैसे? भारतीय सरकार और रिज़र्व बैंक रुपये में आयी गिरावट से उभरने के लिए कितने सक्षम है ? जानिए हमारी नारायण रामचंद्रन के साथ चली इस पुलियाबाज़ी में | नारायण एक इन्वेस्टर, लेखक, और तक्षशिला इंस्टीटूशन में सीनियर फेलो हैं | इससे पहले नारायण मॉर्गन स्टैनली इंडिया के प्रमुख और RBL बैंक के ग़ैर-कार्यकारी अध्यक्ष रह चुके है |

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Ep. 17: मिलिट्री-जिहादी कॉम्प्लेक्स: पाकिस्तान का दूसरा चेहरा

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नवजोत सिंह सिद्धू की झप्पी ने बड़ा बवाल उठा दिया भारत में | तो इस बार की पुलियाबाज़ी पाकिस्तान के मिलिट्री-जिहादी कॉम्प्लेक्स पर | ऐसा क्यों कि भारत-पाकिस्तान के रिश्ते सुधारने की कोई कोशिश के शुरू होते ही आतंकवादी हमले उस प्रक्रिया को विफल कर देते हैं? हमारा दावा है कि इस प्रकरण को समझने के लिए हमें जानना होगा कि पाकिस्तान में एक नहीं दो हुकूमतें है ! एक तो है उनकी सिविलियन सरकार और दूसरा - मिलिट्री-जिहादी कॉम्प्लेक्स (MJC) | कौनसी बला है यह MJC और भारत को इसका सामना कैसे करना चाहिए, जाने इस अंक में |

इस विषय पर और जानने के लिए पढ़े यह पेपर:
The Other Pakistan: Understanding the Military-Jihadi Complex
 

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Ep. 16: आज़ाद भारत का रिपोर्ट कार्ड

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पुलियाबाज़ी के इस Independence Day Special अंक में प्रस्तुत है हमारे दृष्टिकोण से आज़ादी का लेखा-जोखा | कौनसी चुनौतियों को हमने हराया है और कौन सी मुश्किलों से हम आज भी जूझ रहे है, इन प्रश्नों पर सुनिए एक चर्चा |
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Ep. 14: तारीख़ पे तारीख़

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हमारे न्यायतंत्र की ढिलाई से शायद हर इंसान वाक़िफ़ है. तो पुलियाबाज़ी के इस अंक में हमने गोता लगाया इस ढिलाई के कारणों को समझने के लिए, सूर्य प्रकाश के साथ. सूर्य प्रकाश, दक्ष नामक संस्था में फ़ेलो और प्रोग्राम डिरेक्टर हैं. दक्ष संस्था पिछले कई सालों से, न्यायतंत्र की दक्षता बढ़ाने पर शोधकार्य कर रही है. उनकी State of The Indian Judiciary रिपोर्ट, हमारे कोर्ट सिस्टम की हालत बख़ूबी बयां करती है.

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Ep. 12: चीन, एक खोज - भाग 2

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कहने के लिए तो चीन हमारा पडोसी देश है पर वास्तव में हम चीन के बारे में बहुत कम जानते है | इस जानकारी के अभाव के कारण हम लोग या तो हम चीन की तरक्की से मंत्रमुग्ध हो जाते है या फिर उसे एक जानी दुश्मन का दर्जा दे देते है | यह दोनों दृष्टिकोण हमें चीन की असलियत से और दूर ले जाते है | तो चीन को कुछ गहराई से समझने के लिए हमने बात की मनोज केवलरमानी से, जो तक्षशिला इंस्टीटूशन में भारत-चीन संबंधों पर काम करते है | उनका साप्ताहिक न्यूज़लेटर Eye on China  चीन की घरेलु नीतियों पर प्रकाश डालता है |

यह चीन एक खोज का दूसरा भाग है | भाग 1 में हमने बातें की थी चीन के बीसवें सदी के इतिहास और समाज पर | इस भाग में सुनिए पुलियाबाज़ी चीन के तत्कालीन नज़रिये अर्थव्यवस्था, विदेश नीति, और टेक्नोलॉजी पर |

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Ep. 11: चीन, एक खोज - भाग 1

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कहने के लिए तो चीन हमारा पडोसी देश है पर वास्तव में हम चीन के बारे में बहुत कम जानते है | इस जानकारी के अभाव के कारण लोग या तो चीन की तरक्की से मंत्रमुग्ध हो जाते है या फिर उसे एक जानी दुश्मन का दर्जा दे देते है | यह दोनों दृष्टिकोण हमें चीन की असलियत से और दूर ले जाते है | तो चीन को कुछ गहराई से समझने के लिए हमने बात की मनोज केवलरमानी से, जो तक्षशिला इंस्टीटूशन में भारत-चीन संबंधों पर काम करते है | उनका साप्ताहिक न्यूज़लेटर Eye on China (https://www.thinkpragati.com/category/world/china/) चीन की घरेलु नीतियों पर प्रकाश डालता है |

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Ep. 10: युवा भारत क्या चाहता है?

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भारत की आधी जनसंख्या २७ साल से कम उम्र की है | इसीलिए यह जानना ज़रूरी है कि इस वर्ग के लोगों की आशायें, चिंतायें, और आकांक्षायें क्या हैं | तो पुलियाबाज़ी के इस एपिसोड में सौरभ और प्रणय ने बात की पत्रकार और लेखक स्निग्धा पूनम से - जिनकी नयी किताब “Dreamers: How Young Indians are Changing the World" भारत के कुछ महत्वाकांक्षी युवक-युवतियों की ज़िन्दगी पर प्रकाश डालती है |

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