Ep. 39: क्या राष्ट्रवाद भी लिबरल हो सकता है?

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भारतीय राष्ट्रवाद की ख़ासियत यह है कि वह शुरुआत से ही उदारवादी रहा है | लेकिन आज के ध्रुवीकृत वातावरण में इन दोनों शब्दों को विरोधाभासी समझा जाने लगा है | कुछ राष्ट्र के स्वनियुक्त रक्षक लिबरल विचारधारा को ज़हरीला मानते है तो खुद को लिबरल मानने वाले राष्ट्रवाद नाम से ही कतरा जाते है |

तो हमने पुलियाबाज़ी की तक्षशिला इंस्टीटूशन के डायरेक्टर नितिन पई के साथ | नितिन लिबरल-राष्ट्रवाद पर कई लेख लिख चुके हैं | उनका मानना है कि सहिष्णुता और उदारवाद भारतीय राष्ट्रवाद के वह अभिन्न हिस्से है जिनकी वजह से भारत आज एक सशक्त देश बन पाया है |

इस पुलियाबाज़ी में हमने चर्चा की इन सवालों पर:
क़ौम क्या है? राष्ट्र, क़ौम, वतन, और देश - क्या यह सभी शब्द समानार्थक है?
अगर राष्ट्र महज़ एक वैचारिक संकल्पना है, तो क्या उसका महत्व कम हो जाता है?
राष्ट्रवाद क्या है? यह शब्द कलंकित क्यों हो गया?
भारतीय राष्ट्रवाद और हिन्दू राष्ट्रवाद में अंतर क्या है? भारतीय राष्ट्रवाद में क्या उदारवादी तत्व है?

The jingoistic, zero-sum version nationalism is back as a powerful, destructive force on the global stage. Yet a few thinkers believe that a tolerant, civic-minded variant of nationalism is a much better alternative than denouncing nationalism. So in this episode, we explore the liberal side of Indian nationalism with Nitin Pai, Director of the Takshashila Institution. Nitin argues that the nationalism we are overdosing ourselves with is not the inclusive one that created India, but the divisive one that created Pakistan and that those who attack pluralism in the name of nationalism are opening cracks and fissures in the carefully constructed edifice of India’s unity.

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Ep. 37: ये लिबरल आख़िर है कौन?

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लिबरलिस्म अर्थात स्वातंत्रवाद आज एक विस्फोटक शब्द हो गया है | लेकिन ये लिबरल होने का आख़िर मतलब क्या होता है? इस प्रश्न का उत्तर खोजते हुए हम फ्रेडरिक हायेक (1899-1992) के लेख पढ़ने लगे | हायेक लिबरल विचारधारा की एक महत्वपूर्ण हस्ती है | The Use of Knowledge in Society, The Road to Serfdom और Law, Legislation, and Liberty हायेक के कुछ धमाकेदार लेख है जो आज भी बेहद प्रासंगिक है | उनकी पहली किताब के प्रकाशन को हाल ही ७५ साल हुए तो हमने सोचा उनके विचारों से हमारे श्रोताओं को अवगत कराया जाए |

लिबरल विचारधारा और हायेक की इन रचनाओं पर चर्चा करने के लिए हमारे साथ है अमित वर्मा | अमित एक लेखक और पॉडकास्टर है | अमित कई अखबारों में लिबरलिस्म, क्रिकेट, और राजनीति जैसे विषयों पर लिखते हैं | उनका अंग्रेजी पॉडकास्ट The Seen and The Unseen भारत के श्रेष्ठ पॉडकास्ट में से एक है |

Every “-ism” is built on a set of canonical ideas and influential personalities. And one such leading thinker behind the liberalism philosophy is Friedrich August Hayek (1899-1992). His landmark book The Road to Serfdom completed 75 years recently. This book was meant to warn readers that government regulation of our economic lives amounts to totalitarianism.

In another influential essay The Use of Knowledge in Society, Hayek writes that a centrally planned economy can never match the efficiency of the open market because what is known by a single agent is only a small fraction of the sum total of knowledge held by all members of society.

In this episode, Amit Varma joins us to discuss the relevance of Hayek’s key ideas in today’s India. Amit is a writer and commentator who won the Bastiat Prize for Journalism in 2007. Today, he is one of the few original thinkers on liberalism in India. He is known for his blog India Uncut and his podcast The Seen and The Unseen. He also edited the ThinkPragati magazine between 2016 and 2018.

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Ep. 36: ज़िन्दगी की चाबी

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कुछ ही महीनों पहले चीन के एक वैज्ञानिक ने जीनोम-एडिटिंग का उपयोग कर जुड़वां बच्चियाँ बनाकर पूरे जगत को हिला दिया | जीन एडिटिंग ने ‘कुदरत बनाम परवरिश’ विवाद को एक नया आयाम दे दिया है | तो इस बार पुलियाबाज़ी पर लेकर आए हैं हम एक वैज्ञानिक को जीन्स, जीन एडिटिंग बारे में विस्तार से चर्चा करने के लिए | हमारी गेस्ट है शांभवी नाईक, जो एक कैंसर बायोलॉजिस्ट हैं और तक्षशिला इंस्टीटूशन में रिसर्च फेलो हैं | हमने उनसे जीवशास्त्र से जुड़े कई सवालों पर चर्चा की:

जीन्स क्या होते हैं? उनका एक कोशिका में उपयोग क्या है? क्या जीन्स सच में ‘स्वार्थी’ होते हैं?
युजेनिक्स ने जीन शोध का किस प्रकार दुरुपयोग किया?
जीन एडिटिंग क्या है? इसके फायदे क्या हैं?
जीन एडिटिंग पर सरकारी नीतियाँ कैसे तय की जानी चाहिए?

Rapid advances in gene editing techniques have given a fresh impetus to the ‘nature vs nurture’ debate. So in the next edition of Puliyabaazi, we brought in a science policy researcher for an in-depth chat on genes, genetics, and the genetic revolution. Our guest is Shambhavi Naik, a Fellow at the Takshashila Institution. We discussed these topics and more in this episode:
What are genes? How do gene expression pathways work?
Can genes be linked to racial identity?
How has gene sequencing changed our understanding of heredity and human history?
What is gene editing and why is everyone talking about this? Is this the same as cloning?
Will gene editing lead to the same eugenics race we saw in the 1920-1940s? Will we have superhumans roaming on earth?
How should India govern gene editing?

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Ep. 35: ख़ुफ़िया बातें

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जासूसी एक ऐसा पेशा है जिसके बारे में न सिर्फ हम कम जानते है बल्कि अक़्सर सरासर ग़लत भी जानते है | फिल्मों में इस पेशे को इस तरह दर्शाया जाता है कि इंटेलिजेंस अफ़सर कई दिव्य शक्तियों के मालिक लगने लगते है | तो इस बार की पुलियाबाज़ी एक असली इंटेलिजेंस अफ़सर के साथ इस पेशे के बारे में | हमने बात की भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) के भूतपूर्व प्रमुख विक्रम सूद के साथ | यह चर्चा सूद जी की बेहतरीन किताब ‘The Unending Game: A Former R&AW Chief’s Insights into Espionage’ पर आधारित है | चर्चा में उठे कुछ सवाल:

  1. इंटेलिजेंस एजेंसी चार प्रकार के काम करती है - collection, analysis, dissemination, और operation| इन चारों को करने के लिए क्या ख़ूबियाँ चाहिए एक अफ़सर में?

  2. एक ख़ुफ़िया(covert) ऑपरेशन का मतलब क्या होता है? स्पेशल ऑपरेशन क्या होता है?

  3. भारत में ही नहीं पर पूरे विश्व में TECHINT की एक लहर आयी थी लेकिन अब CIA भी
    मानती है कि HUMINT को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता भले ही टेक्नोलॉजी कितनी ही अच्छी क्यों न हो जाए| ऐसा क्यों?

4."इंटेलिजेंस failure" होता क्या है?

  1. आज ख़ुफ़िया एजेंसियों का ध्यान आतंकवाद पर केंद्रित रहता है | इसका एक इंटेलिजेंस एजेंसी पर क्या असर पड़ता है?

  2. ३० साल बाद की इंटेलिजेंस एजेंसी को क्या क्या करना होगा?

  3. इंटेलिजेंस एजेंसियों में सुधार कहाँ से शुरू किया जाए?

Intelligence is one of the oldest professions known. Even the Arthashastra describes in detail the various methods of using spying as a tool of statecraft. And yet, enamoured by glorified portrayals of intelligence agencies on-screen, our knowledge about this discipline has many gaps. So in this episode we spoke to Mr Vikram Sood about the state of the profession today and the challenges faced by intelligence officers. Mr Sood headed India’s premier intelligence agency R&AW between 2000 and 2003. His book The Unending Game: A Former R&AW Chief’s Insights into Espionage is an excellent guide for understanding intelligence and espionage. During the course of this conversation, we discussed:

  1. How does the working of an external intelligence agency differ from that of an internal security service like IB, MI5 etc?

  2. What does the term ‘covert operation’ mean? How is a special operation different from a covert one?

  3. How important is the human element in the intelligence cycle? Can technology replace humans here?

  4. What is meant by an intelligence failure?

  5. What should be the essential elements of reforming intelligence agencies?

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Ep. 34: हमारी राजनीति आख़िर ऐसी क्यों है?

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2019 मतदान क़रीब है और राजनीति की हवा किस दिशा में बह रही है, इस पर हर भारतीय का अपना एक मत तो ज़रूर है| अक़्सर लोग कहते हैं कि भारत में राजनीति विचारधाराओं से परे है ; वह केवल नेताओं के व्यक्तित्व, भ्रष्टाचार, या फ़िर जातिगत समीकरण पर केंद्रित है | पर इन आम धारणाओं में कितना सच है, इसी विषय पर इस हफ़्ते की पुलियाबाज़ी राहुल वर्मा (फेलो, राहुल सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च) के साथ| राहुल और प्रदीप छिब्बर की नई किताब Ideology & Identity: The Changing Party Systems of India भारतीय राजनीति की संरचना पर एक गहन अध्ययन है |

राहुल से हमने इन सवालों पर पुलियाबाज़ी की:

भारतीय राजनीति की विचारधारा के स्तंभ क्या है?
स्वतंत्र होने से पहले क्या सोच थी सरकार के समाज में रोल के बारे में ? स्वतंत्र भारत में क्या कहानी रही है?
क्या वोट खरीदने से ही सरकारें बन जाती हैं?
क्या जाति सबसे बड़ा फैक्टर है हमारी राजनीति में?
नेताओं के व्यक्तित्व का क्या असर होता है वोटर पर?
एक और मान्यता है कि काडर (संगठन) वाली पार्टिया सफल होती है | कितना सच है इसमें?
२०१४ में जो नतीजा आया वह क्यों आया?

The 2019 elections are around the corner. Instead of adding to the chatter on electoral predictions, we present an in-depth chat with Rahul Verma (Fellow, Centre for Policy Research) on the structure of Indian politics. Rahul is the co-author of Ideology & Identity: The Changing Party Systems of India, a book that challenges common assumptions that Indian polity is chaotic, clientelistic, corrupt, and devoid of any ideology. Instead, they claim that the most important ideological debates in India are centred on statism-the extent to which the state should dominate and regulate society-and recognition-whether and how the state should accommodate various marginalised groups and protect minority rights from majorities.

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Ep. 33: बुंदेलखंड से उठती खबरों की एक लहर

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इस बार की पुलियाबाज़ी भारत के एकमात्र ग्रामीण, नारीवादी न्यूज़ चैनल - ख़बर लहरिया - के साथ | २००२ में स्थापित हुआ यह नेटवर्क अपनी बेबाक रिपोर्टिंग के लिए मशहूर है | तो हमने पुलियाबाज़ी की दिशा मलिक (मैनेजिंग डायरेक्टर) और कविता देवी (डिजिटल हेड) के साथ | पहले हमने बात की खबर लहरिया की सफलताएँ और चुनौतियाँ के बारे में | फ़िर हमने समझने की कोशिश की उत्तर प्रदेश के पिछड़े इलाक़े - बुंदेलखंड - को, ख़बर लहरिया के दृष्टिकोण से |

This episode of Puliyabaazi is on India’s only women-run rural media network - Khabar Lahariya. Employing women from Dalit, tribal, Muslim and backward castes, the network has won several national and global awards for their pioneering rural journalism. We spoke to Disha Mullick, Managing Director and Kavita Devi, Digital Head from the Khabar Lahariya team about:
How did Khabar Lahariya start? What have been some stages in KL’s development since it came into being in 2002?
What challenges do KL’s women reporters face while investigating issues in a patriarchal society?
How is rural Bundelkhand like? What are some changes that KL has noticed in governance over the years?

सुनिए और बताइये कैसा लगा यह एपिसोड आपको|

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Ep. 32: IL&FS से DHFL तक - क्यों लड़खड़ा रहे हैं NBFC?

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भारत में तक़रीबन 90 बैंक है पर 10000 ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कम्पनियाँ (NBFC) हैं जबकि दोनों संस्थाओं का एक ही रोल है - किफ़ायती क़र्ज़ उपलब्ध करा पाना | कोबरापोस्ट वेबसाइट ने इनमें से एक - DHFL - पर जनवरी में आरोप लगाया था कि इस कम्पनी ने 31 हजार करोड़ रुपए का घोटाला किया है! इसे ‘भारत के इतिहास का सबसे बड़ा बैंकिंग स्कैम’ करार दिया गया था।भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में NBFC पर नियंत्रण कैसे हो यह एक ज्वलंत विषय है | तो इस एपिसोड में हमने कोशिश की समझने की यह NBFC बला क्या है? इस विषय पर पुलियाबाज़ी के लिए हमारे साथ है दो विशेषज्ञ - हर्ष वर्धन और नारायण रामचंद्रन | हर्ष एसपी जैन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च (SPJIMR) में फेलो है | नारायण एक इन्वेस्टर, लेखक, और तक्षशिला इंस्टीटूशन में सीनियर फेलो हैं | इससे पहले नारायण मॉर्गन स्टैनली इंडिया के प्रमुख और RBL बैंक के ग़ैर-कार्यकारी अध्यक्ष रह चुके है | इस विषय पर पढ़िए हर्ष के विचार ब्लूमबर्गक्विंट पर और नारायण का लेख मिंट अखबार में|

इस पुलियाबाज़ी में हमने उनके सामने यह सवाल रखे:
ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी मतलब NBFC क्या होती है?
NBFC और मिक्रोफिनांस संस्थाओं में क्या अंतर है?
इस तरह की कम्पनियों का भारत में फैलाव कैसा रहा है?
क्या यह फैलाव दुसरे देशों के समरूप रहा है या फिर भारत की अर्थव्यवस्था में NBFC का प्रचलन ज़्यादा/कम है? और ऐसा क्यों?
IL&FS कर्ज पर ब्याज की किश्त चुकाने में असमर्थ रही है। क्या इस वाक़िये से NBFC पर कुछ फर्क पड़ा है?
NBFC पर रेगुलेशन में हम कोताई बरत रहे है | तो क्या ग़लत है और उसे ठीक कैसे किया जाए?

Soon after IL&FS scam in October 2018 comes another one in January 2019 - the DHFL scam. Terming this as India’s biggest ever banking scam, investigative website Cobrapost alleged a misuse of an astronomical sum of 31,000 crores. Both these companies are classified as Non-Banking Financial Companies (NBFCs). So in this episode, we return to a core issue in the Indian economy - why are they falling apart and how to regulate such institutions. And why do we even need NBFCs in our economy. Harsh Vardhan (Fellow at the Centre for Financial Services, SPJIMR) and Narayan Ramachandran (Senior Fellow, Takshashila Institution) join us as guests for a puliyabaazi on this issue.

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Ep. 21: Raid के पीछे, एक टैक्स अफ़सर की ज़ुबानी

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मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘नमक का दरोगा’ एक ईमानदार टैक्स इंस्पेक्टर के सामने आने वाली चुनौतियों की अमर दास्ताँ है | तो इस बार पुलियाबाज़ी में हमने समझना चाहा कि एक युवा सरकारी अफ़सर की ज़िन्दगी आख़िर कैसी होती है ? क्यों आज भी कुछ इंजीनियर और डॉक्टर सरकारी अफ़सर बनना पसंद करते है ?

यह सब बताया हमें सलिल बिजूर ने, जो आयकर विभाग के इन्वेस्टीगेशन विंग में डिप्टी डायरेक्टर है | इस पुलियाबाज़ी में उन्होंने बताया कि लोग टैक्स बचाने के लिए क्या-क्या नायाब तरीक़े अपनाते है | उन्होंने टैक्स व्यवस्था में सुधार करने के भी कुछ सुझाव दिए |

Ep. 14: तारीख़ पे तारीख़

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हमारे न्यायतंत्र की ढिलाई से शायद हर इंसान वाक़िफ़ है. तो पुलियाबाज़ी के इस अंक में हमने गोता लगाया इस ढिलाई के कारणों को समझने के लिए, सूर्य प्रकाश के साथ. सूर्य प्रकाश, दक्ष नामक संस्था में फ़ेलो और प्रोग्राम डिरेक्टर हैं. दक्ष संस्था पिछले कई सालों से, न्यायतंत्र की दक्षता बढ़ाने पर शोधकार्य कर रही है. उनकी State of The Indian Judiciary रिपोर्ट, हमारे कोर्ट सिस्टम की हालत बख़ूबी बयां करती है.

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Ep. 12: चीन, एक खोज - भाग 2

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कहने के लिए तो चीन हमारा पडोसी देश है पर वास्तव में हम चीन के बारे में बहुत कम जानते है | इस जानकारी के अभाव के कारण हम लोग या तो हम चीन की तरक्की से मंत्रमुग्ध हो जाते है या फिर उसे एक जानी दुश्मन का दर्जा दे देते है | यह दोनों दृष्टिकोण हमें चीन की असलियत से और दूर ले जाते है | तो चीन को कुछ गहराई से समझने के लिए हमने बात की मनोज केवलरमानी से, जो तक्षशिला इंस्टीटूशन में भारत-चीन संबंधों पर काम करते है | उनका साप्ताहिक न्यूज़लेटर Eye on China  चीन की घरेलु नीतियों पर प्रकाश डालता है |

यह चीन एक खोज का दूसरा भाग है | भाग 1 में हमने बातें की थी चीन के बीसवें सदी के इतिहास और समाज पर | इस भाग में सुनिए पुलियाबाज़ी चीन के तत्कालीन नज़रिये अर्थव्यवस्था, विदेश नीति, और टेक्नोलॉजी पर |

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Ep. 11: चीन, एक खोज - भाग 1

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कहने के लिए तो चीन हमारा पडोसी देश है पर वास्तव में हम चीन के बारे में बहुत कम जानते है | इस जानकारी के अभाव के कारण लोग या तो चीन की तरक्की से मंत्रमुग्ध हो जाते है या फिर उसे एक जानी दुश्मन का दर्जा दे देते है | यह दोनों दृष्टिकोण हमें चीन की असलियत से और दूर ले जाते है | तो चीन को कुछ गहराई से समझने के लिए हमने बात की मनोज केवलरमानी से, जो तक्षशिला इंस्टीटूशन में भारत-चीन संबंधों पर काम करते है | उनका साप्ताहिक न्यूज़लेटर Eye on China (https://www.thinkpragati.com/category/world/china/) चीन की घरेलु नीतियों पर प्रकाश डालता है |

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Ep. 10: युवा भारत क्या चाहता है?

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भारत की आधी जनसंख्या २७ साल से कम उम्र की है | इसीलिए यह जानना ज़रूरी है कि इस वर्ग के लोगों की आशायें, चिंतायें, और आकांक्षायें क्या हैं | तो पुलियाबाज़ी के इस एपिसोड में सौरभ और प्रणय ने बात की पत्रकार और लेखक स्निग्धा पूनम से - जिनकी नयी किताब “Dreamers: How Young Indians are Changing the World" भारत के कुछ महत्वाकांक्षी युवक-युवतियों की ज़िन्दगी पर प्रकाश डालती है |

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Ep. 9: भारत और अफ़ग़ानिस्तान : काबुलीवाला से तालिबान तक

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क्या एक R&AW अफसर की जिंदगी "टाइगर" के सलमान जैसी होती है? तालिबान की बर्बरतापूर्ण सरकार को अफ़ग़ानिस्तान से हटाने में भारत का क्या योगदान था? पाकिस्तान तालिबान को किस तरह समर्थन देता है? पुलियाबाज़ी के इस अंक में इन सब सवालों का जवाब जानिये श्री आनंद आरणी से -- जिन्होंने भारत की इंटेलिजेंस एजेंसी R&AW के लिए अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान मामलों पर तक़रीबन तीन दशक काम किया है |

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Ep. 8: सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में

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राहत इंदौरी के शब्दों में – ‘सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में, किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है’| पिछले ७-८ सालों में आयी जेनेटिक क्रांति राहत इंदौरी के इस कथन का प्रमाण दे रही है | और इसलिए हमने पुलियाबाज़ी के इस अंक में डेविड राइख की किताब ‘Who We Are and How We Got Here'  के भारत पर आधारित अध्याय पर चर्चा की | इस एपिसोड में जानिये क्यूँ हर भारतीय का ९००० साल पहले ईरान से आये हुए लोगों से एक अटूट रिश्ता है, और क्यूँ हर भारतीय आख़िर एक फॉरेनर है !

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Ep. 7: भारत को इनोवेटिव कैसे बनाये

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जसपाल भट्टी के फ्लॉप शो का वह एपिसोड तो याद होगा आपको जिसमें एक PhD student और उसके गाइड की जद्दोजहद को दर्शाया गया है | था तो वह एक व्यंग्य पर उसमें हमारी शिक्षा प्रणाली पर की गयी आलोचना सटीक है | तो पुलियाबाज़ी के इस अंक में हमने बात की वरुण अग्रवाल से, जिन्होंने उनकी नयी किताब “Leading Science and Technology: India Next?” में भारत के रिसर्च इकोसिस्टम का विश्लेषण किया है | पुलियाबाज़ी इस बात पर थी कि भारत में इनोवेशन की गति कैसे बढ़ाई जाए |

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Ep. 6: बिटकॉइन – एक क्रांतिकारी सोच

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ऐसा क्या है बिटकॉइन में कि इस व्यवस्था ने सब सरकारों को चौकन्ना रहने पर मजबूर कर दिया है ? जानिये पुलियाबाज़ी के इस अंक में नीलेश त्रिवेदी (@nileshtrivedi) से, जो इंडियम नामक ब्लॉकचेन डेवलपर कम्युनिटी से जुडे हुए है |

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Ep. 5: आज उधार, कल नकद

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भारत में किफ़ायती क्रेडिट का आख़िर इतना अभाव क्यों है? हर ‘मदर इंडिया’ जैसी कहानी में एक सुखीलाला को क्यों होता है? जानिये इस एपिसोड में प्रिया शर्मा से, जो क्रेडिट पर आधारित एक स्टार्ट-अप की सीएफओ है |

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Ep. 04: मसला-ए-जम्मू कश्मीर

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७० साल बाद भी कश्मीर का मुद्दा सुलझता क्यों नहीं? सुनिए इस पेचीदा मामले पर एक बेबाक चर्चा हमारे नये एपिसोड में |

*

After seven decades, the Kashmir problem festers on. Pranay and Saurabh carry out a close analysis of the problem.

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Ep. 03: Budget बेवफा!

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बजट पर इतना बावलापन क्यों? अगर आप बजट बनाते तो क्या नया करते? सुनिये कुछ विचार पुलियाबाज़ी के इस एपिसोड में।

*
What is there left to say about the budget? Plenty, as you will find out when you hear Pranay Kotasthane and Saurabh Chandra go at it in episode 3 of PuliyaBaazi

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Ep. 02: ये Republic क्या बला है?

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What does it mean to be a Republic? Pranay Kotasthane and Saurabh Chandra discuss the nature of our constitutional republic in episode 2 of PuliyaBaazi.

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