Ep. 34: हमारी राजनीति आख़िर ऐसी क्यों है?

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2019 मतदान क़रीब है और राजनीति की हवा किस दिशा में बह रही है, इस पर हर भारतीय का अपना एक मत तो ज़रूर है| अक़्सर लोग कहते हैं कि भारत में राजनीति विचारधाराओं से परे है ; वह केवल नेताओं के व्यक्तित्व, भ्रष्टाचार, या फ़िर जातिगत समीकरण पर केंद्रित है | पर इन आम धारणाओं में कितना सच है, इसी विषय पर इस हफ़्ते की पुलियाबाज़ी राहुल वर्मा (फेलो, राहुल सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च) के साथ| राहुल और प्रदीप छिब्बर की नई किताब Ideology & Identity: The Changing Party Systems of India भारतीय राजनीति की संरचना पर एक गहन अध्ययन है |

राहुल से हमने इन सवालों पर पुलियाबाज़ी की:

भारतीय राजनीति की विचारधारा के स्तंभ क्या है?
स्वतंत्र होने से पहले क्या सोच थी सरकार के समाज में रोल के बारे में ? स्वतंत्र भारत में क्या कहानी रही है?
क्या वोट खरीदने से ही सरकारें बन जाती हैं?
क्या जाति सबसे बड़ा फैक्टर है हमारी राजनीति में?
नेताओं के व्यक्तित्व का क्या असर होता है वोटर पर?
एक और मान्यता है कि काडर (संगठन) वाली पार्टिया सफल होती है | कितना सच है इसमें?
२०१४ में जो नतीजा आया वह क्यों आया?

The 2019 elections are around the corner. Instead of adding to the chatter on electoral predictions, we present an in-depth chat with Rahul Verma (Fellow, Centre for Policy Research) on the structure of Indian politics. Rahul is the co-author of Ideology & Identity: The Changing Party Systems of India, a book that challenges common assumptions that Indian polity is chaotic, clientelistic, corrupt, and devoid of any ideology. Instead, they claim that the most important ideological debates in India are centred on statism-the extent to which the state should dominate and regulate society-and recognition-whether and how the state should accommodate various marginalised groups and protect minority rights from majorities.

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