Ep. 47: झूठी खबरों का असली सच

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Fake news, disinformation, misinformation, and social media manipulation — these are elements of perhaps the most significant global story of these times. And yet, this phenomenon remains underexplored. We do not fully understand what causes people to generate, share, and believe in fake propaganda. So in this episode, we discuss the anatomy of fake news with Pratik Sinha, editor and co-founder of AltNews — a fact-checking website that debunks misinformation on social and mainstream media.

Whatsapp पर शेयर होने वाली झूठी खबरों से तो निश्चित ही आप भी तंग होंगे| इन झूठी खबरों का फैलाव सिर्फ एक मार्केट या सरकार की विफलता का नतीजा नहीं है बल्कि एक सामाजिक कुरीति के रूप में उभरा है | तो इस एपिसोड में हमने पुलियाबाज़ी की “फेक न्यूज़” पर प्रतिक सिन्हा के साथ| प्रतिक ऑल्ट न्यूज़ नाम की फैक्ट-चेकिंग वेबसाइट के रचयिता है | इस वेबसाइट ने झूठी खबरों का पर्दाफ़ाश करने का बीड़ा उठाया है| तो प्रतीक से हमने चर्चा की इन विषयों पर:

  • Misinformation, disinformation, झूठी ख़बर - इन सब में क्या अंतर हैं?

  • पहले ख़बरों का स्त्रोत सिर्फ़ कुछ एक अख़बार थे। सनसनीख़ेज़ ख़बर की डिमांड तो तब भी उतनी ही रही होगी जितनी अब भी है। तो इंटर्नेट के पहले की झूठी ख़बर और आज के हालात में क्या मूलभूत फ़र्क़ हैं?

  • किस प्रकार की झूठी ख़बर ज़्यादा प्रचलित होती है और किस प्रकार की कम?

  • आयोजित कैसे होती है यह झूठी ख़बर?

  • क्या whatsapp/facebook/ट्विटर इत्यादि पर misinformation की कुछ विशेषताए हैं क्या? मसलन, क्या whastapp पर images के द्वारा फ़ेक न्यूज़ ज़्यादा फैलती है? या facebook में कुछ और ज़रिया है?

  • टीकाकरण से अक्सर तुलना होती है fact-checking की। सरकार का क्या रोल है इस झूठी ख़बर के ख़िलाफ़ टीकाकरण में?

  • Science मैगज़ीन में एक लेख था कि fact-checking शायद काफ़ी नहीं है इस चुनौती से लड़ने के लिए| फिर इसका हल क्या है?

  • आगे क्या चुनौतियाँ है फैक्ट-चेकर्स के लिए? क्या ‘deep fakes’ इत्यादि से भी लड़ेगी altnews?

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Ep. 46: रॉकेट रॉकेट

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The events surrounding Chandrayaan-2’s landing attempt captured India’s imagination earlier this month. This also gave us a reason to talk about Space on Puliyabaazi again. In our previous episode on space, we discussed the story of ISRO. In this episode, we explore the world of rocketry — the enabling technology for space exploration. Joining us in this conversation is Divyanshu Poddar, co-founder of Rocketeers — India’s first solid fuel-powered model rocket kit manufacturer.

Some themes that came up during our conversation:

  • What is the economics of rockets?

  • What is qualitatively different about a rocket that takes us to Low-earth orbit, Geostationary orbit, Moon, and Mars

  • What is the economic potential of space? What has changed now that startups can do rockets instead of nation-states?

अंतरिक्ष में अनुसंधान का नाम लेते ही ISRO का ही नाम ध्यान में आता है लेकिन भारत में अब कई कंपनिया उपग्रह, रॉकेट, इमेजिंग इत्यादि पर उम्दा काम कर रही हैं | तो इस बार हमने बात की उनमें से एक कंपनी रॉकेटियर्स के दिव्यांशु पोद्दार से, रॉकेट जगत के बारे में | रॉकेट कैसे बनाए जाते हैं?, किस प्रकार के होते हैं?, रॉकेट टेक्नोलॉजी का भविष्य क्या है? - अगर आप इन सवाल में रूचि रखते हैं तो यह एपिसोड ज़रूर सुने |

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Ep. 45: पूर्वोत्तर भारत - अंदर कौन और बाहर कौन?

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The National Registry of Citizens (NRC) has been in the national news recently. So in this episode, we take a step back to understand the causes and dynamics of insider-outsider tensions in North-East India. Joining us is author and journalist Samrat, who has co-edited a book with Preeti Gill on this topic, titled Insider-Outsider: Belonging and Unbelonging in North-East India.

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Ep. 44: दास्ताँ-ए-बलोचिस्तान

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बलोचिस्तान आजकल भारत में एक बहुचर्चित विषय हो गया है | प्रधानमंत्री मोदी ने तीन साल पहले अपने स्वतंत्रता दिवस भाषण में इसका उल्लेख किया | इससे पहले पाकिस्तान ने भारत के एक नागरिक कुलभूषण जाधव को ईरान से कब्ज़े में ले लिया और आरोप लगाया कि भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी R&AW बलोचिस्तान में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा दे रही है |

तो इस बार की पुलियाबाज़ी बलोचिस्तान पर तिलक देवाशर के साथ | देवाशर जी Pakistan: The Balochistan Conundrum के लेखक है और पाकिस्तान मामलों पर पिछले चार दशकों से काम कर रहे है | उनसे हमने चर्चा की इन सवालों पर:

  • बलोचिस्तान के बारे में सबसे पहले तो यह समझना ज़रूरी है कि आज यह तीन देशों में विभाजित है - यह कैसे हुआ?

  • रही बात सिर्फ़ पाकिस्तानी बलोचिस्तान की तो उसमें भी कई भाषायें, कई जनजातियाँ, कई
    धर्म है | इसकी क्या कहानी है? क्या इन जनजातियों की भिन्नता के बीच “बलोच एक क़ौम”
    की भावना आज कमज़ोर हुई है या पहले से और मज़बूत?

  • आज़ादी के वक़्त कलात रियासत का अंग्रेज़ों के साथ क्या arrangement था? ११ अगस्त
    को कलात किस तरह आज़ाद हुआ और फिर पाकिस्तान का हिस्सा बन गया?

  • पाकिस्तानी बलोचिस्तान की पाकिस्तानी राष्ट्र से आज की तारीख़ में क्या शिकायत है?

  • बलोचिस्तान में पाँचवी बग़ावत चल रही है। हर नयी बग़ावत पिछली बग़ावत से ज़्यादा
    व्यापक और प्रभावशाली रही है। ऐसा क्यों?

  • आज एक बड़ा मामला है गुमशुदगी का - कई बलोच कार्यकर्ता गुमशुदा हो जाते है
    एकाएक। यह मानवाधिकार उल्लंघन कैसे और क्यों लगातार जारी है?

  • बलोचिस्तान और कश्मीर में चल रही insurgency में क्या मूलभूत समानताएँ है और क्या
    मूलभूत फ़र्क़ है?

  • पाकिस्तान की तरफ़ से हमेशा कहा जाता है कि भारत बलोचिस्तान में अस्थिरता का एक
    बड़ा कारण है। इसमें कितनी सच्चाई है?

In this week’s episode, we discuss the political history, present, and future of Balochistan. The Baloch people are spread across three modern nation-states - a handiwork of the British rule. In two of them - Iran and Pakistan - they are an oppressed minority.

Pakistani Balochistan itself occupies 44 per cent of Pakistan’s area but accounts for less than 5 per cent of its population. Politically, the idea of the Baloch nation has been at loggerheads with the idea of Pakistan even before the latter’s independence. That struggle continues to this day.

What are the roots of this insurgency and what is its likely future? Tilak Devasher, a former R&AW senior official and author of Pakistan: The Balochistan Conundrum joins us in this Puliyabaazi to uncover the politics of Balochistan and its troublesome relationship with the Pakistani State.
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Ep. 43: बौद्धिक सम्पदा: पेटेंट, कॉपीराइट, और ट्रेड सीक्रेट की कहानी

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बौद्धिक सम्पदा: पेटेंट, कॉपीराइट, और ट्रेड सीक्रेट की कहानी
कोका कोला के ट्रेड सीक्रेस्ट फॉर्मूले की कहानियाँ तो सभी ने सुनी है | पर यह कॉपीराइट, पेटेंट, और ट्रेड सीक्रेट आख़िर है क्या? बौद्धिक सम्पदा (Intellectual Property) के अधिकार के यह सभी साधन एक अर्थव्यवस्था के लिए क्या फ़ायदे-नुक़सान लाते हैं? इसी विषय पर सुनिए अगली पुलियाबाज़ी मिहिर महाजन के साथ जो पेटेंट नीति विशेषज्ञ है | कुछ सवाल जिनपर हमारी चर्चा हुई:

  • इंसानी रचनात्मकता की चीज़ें को कैसे प्रॉपर्टी में वर्गीकृत किया जाए?

  • बौद्धिक प्रॉपर्टी पर अधिकार और किसी ठोस प्रॉपर्टी पर अधिकार के बीच क्या अंतर है?

  • Intellectual प्रॉपर्टी में रचयिता को एकाधिकार (monopoly) क्यों दिया जाता है?

  • एकाधिकार की बात विवाद का कारण बन जाती है। एकाधिकार का होना तो एक मार्केट failure होता है। यह तनाव क्यों?

  • आज के दौर में IP की आम परिभाषा ही कुछ डगमगा रही है। ऐसा क्यों?

  • भारत के IP नियम पहले कमज़ोर थे। उसकी वजह से हमको क्या नुक़सान हुए है?

  • इस टूटे ढाँचे को ठीक कैसे किया जाए?

One of the issues in the ongoing US-China trade conflict is rampant intellectual property theft by China. This term — intellectual property rights — is one of those which we often hear about but know very little about. Why are such rights important? How do citizens benefit from a sound intellectual property regime? Are anti-trust laws and patent regulations antagonistic to each other? We discuss this and more in a detailed conversation with Mihir Mahajan, a patent strategy expert.

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Ep. 42: सरकारी काम इतना रुलाते है, सब बेच डालें क्या?

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The debate on governmental reform often takes one of these three turns: privatization, nationalization, or devolution. But none of the three narratives provides a comprehensive framework for reforming government organisations. For example, privatization might not always be possible nor advisable. Similarly, devolution of policy and regulatory roles can have adverse effects on efficiency. Nationalization, on the other hand, distorts markets and often leads to terrible outcomes.

How then should we think about changing government organisations? Osborne and Plastrik’s classic Banishing Bureaucracy: The Five Strategies for Reinventing Government lays out some general strategies for changing the DNA of government organisations. Pranay and Saurabh discuss ideas from the book relevant to the Indian context.

क्यों हमारी ट्राफिक पुलिस इतनी प्रभावहीन है? क्यों एयर इंडिया जैसी सरकारी कंपनी हर दिन पाँच करोड़ का घाटा करती है? HAL जैसे सरकारी संस्थान में क्या सुधार किया जा सकता है? क्यों आज भी सरकारें साबुन बेचने वाली कंपनी चला रही है? इनमें से किसी भी सरकारी संगठन से सरोकार करने की सोच मात्र से हम अक्सर कतराने लगते है | उनकी अक्षमता और निष्फलता सभी को चुभती है | तो इस एपिसोड में हमने चर्चा की कुछ सरकारी संस्थान में सुधार लाने की कुछ रणनीतियों के बारे में |

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Ep. 41: सेमीकंडक्टर दंगल: अमरीका, चीन और सिकिया पहलवान भारत

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The semiconductor microchip is perhaps the greatest modern-day innovation breakthrough. It made radios, TVs, computers, and phones happen. Today, a processor microchip has billions of components and is created using a complex supply chain involving thousands of specialised companies cutting across the globe. This trade network with nodes spread all across the world worked seamlessly at most times. Until now that is. Within the last two years, the technological domain has become one of the key battlegrounds of the ongoing geopolitical tussle between the US and China.

The US has chosen to use the choke points in the semiconductor manufacturing process to constrain China’s technological growth. Given that this conflict is strategic and not economic, semiconpolitics is here to stay. So in this episode, we deep-dive into the geopolitics of semiconductors. Our guest is Anup Rajput, an engineer par excellence who has worked in the semiconductor industry and currently heads engineering functions at an AI start-up, Inkers Technology Pvt Ltd.

In this episode, we discuss:
Supply chains of semiconductor chips
Why has semiconductor manufacturing become such a contentious topic now?
What is the progress China has made on semiconductor manufacturing?
How will the geopolitics between China and the US play out?
What are the opportunities for India in the semiconductor manufacturing space?

सेमीकंडक्टर माइक्रोचिप आधुनिक काल के सबसे क्रांतिकारी अविष्कारों में से एक है | इसके बिना हम कॅल्क्युलेटर, कंप्यूटर, मोबाइल फ़ोन, यह पॉडकास्ट - कुछ भी नहीं बना पाते | वैसे तो माइक्रोचिप का उत्पादन एक गहरा तकनीकी विषय है पर आज इसका प्रयोग एक राजनैतिक अस्त्र के रूप में हो रहा है | अमरीका नहीं चाहता कि चीन उसके वर्चस्व को चुनौती दे और इसी प्रतिस्पर्धा में सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी एक महत्वपूर्ण रोल अदा कर रही है | तो हमने इसी विषय पर पुलियाबाज़ी की अनूप राजपूत से - जो की इस क्षेत्र में पिछले एक दशक से काम कर रहे है| अनूप आजकल एक आर्टिफिशल इंटेलिजेंस स्टार्टअप कम्पनी में इंजीनियरिंग प्रमुख है| हमने की चर्चा इन विषयों पर:

सेमीकंडक्टर क्या होता है?
इसके उत्पादन की सप्लाई चैन किस तरह पूरे विश्व में फैली है |
क्यों इस उत्पादक क्षमता का प्रयोग एक राजनैतिक अस्त्र के रूप में हो रहा है?
भारत की इस क्षेत्र में क्या क्षमताएँ है? क्या भारत सेमीकंडक्टर जगत का नया हीरो बन सकता है?

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Ep. 40: टिकट ख़रीदा रिज़र्व बैंक ने पर क्या लॉटरी लगेगी सरकार की?

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The tussle between the Reserve Bank of India and the Union government has only intensified over the last two years. Governor Urjit Patel resigned in December 2018 and Deputy Governor Viral Acharya resigned earlier this week. Though both of them cited personal reasons there are speculations that the stand-off related to excess funds on RBI’s balance sheet had some role to play.

Now there’s nothing new about tensions between a government and a central bank but what’s new is the bone of contention itself because it involves surplus funds rather than disputes over interest rates. There are no set templates from other countries to be followed here. Many central banks are yet to narrow down on the best possible use of such surplus funds and hence the RBI has constituted a committee under former Governor Bimal Jalan to recommend the way ahead.

So we took a step back and tried to: explore the history of India’s Reserve Bank, uncover the relationship between the Reserve Bank and the government, and ideate on possible solutions to the current stand-off.

Our guest in the episode helping us navigate these choppy waters is Harsh Vora, an investor and trader from Vadodara. Harsh is an alumnus of Takshashila’s Postgraduate Programme in Public Policy and writes on financial matters for Mint.

आर्थिक मामलों में कम ही ऐसे मौके आते है जब किसी सरकार की एकाएक लॉटरी खुल जाती है और उसके पास आर्थिक तंगी की बजाए यह सवाल खड़ा हो जाता है कि इस बोनस को किस पर खर्च किया जाए | ऐसा ही एक ऐतिहासिक मौका भारत की रिज़र्व बैंक के सामने आया है |

हुआ यह है कि रिज़र्व बैंक के पूंजी भण्डार में लाखों करोड़ रुपए जमा हो चुके है | और वित्त मंत्रालय चाहता है कि बैंक सरकार को अधिशेष पूंजी सौंप दे जिससे सरकार इस रक़म का अपनी मर्ज़ी से उपयोग कर सके | दुसरी ओर कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस पूंजी को हाथ नहीं लगाना चाहिए क्योंकि खराब वित्तीय हालत में यह पूँजी दवाई का काम करेगी |

तो हमने इस अवसर का फायदा उठाते हुए चर्चा की रिज़र्व बैंक और सरकार के रिश्तों के बारे में हर्ष वोरा के साथ जो एक इन्वेस्टर और ट्रेडर है | हर्ष तक्षशिला इंस्टीटूशन के पब्लिक पालिसी पोस्टग्रेजुएट प्रोग्राम से उत्तीर्ण हुए है और मिंट अखबार में आर्थिक मामलों पर एक कॉलम भी लिखते है |

इस पुलियाबाज़ी में हमने चर्चा की इन सवालों पर:

  1. रिज़र्व बैंक एक साथ कई रोल अदा कर रहा है - बैंक को रेगुलेट करना, सरकार की लेन-देन, विनिमय दर (exchange rate) मैनेज करना इत्यादि | ऐसे और क्या क्या रोल है जो RBI कर रही है?

  2. सरकार और रिज़र्व बैंक के रिश्ते का इतिहास कैसा रहा है? १९९२ से पहले क्या स्थिति थी? आज क्या है?

  3. रिज़र्व बैंक की बैलेंस शीट बड़ी कष्टमय है, क्या-क्या पुरज़े है इसके?

  4. रुपए की क़ीमत गिरने से RBI की झोली में पैसा बढ़ रहा है - क्या यह कहना ठीक है?

  5. आपदा के लिए रिज़र्व बैंक के पास जो पैसा है यह मात्रा काफी ज़्यादा है - क्या यह कहना ठीक है?

  6. इस झमेले को भविष्य में कैसे सुलझाना चाहिए? इस अतिरिक्त राशि का सबसे बेहतरीन उपयोग क्या है?

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Ep. 39: क्या राष्ट्रवाद भी लिबरल हो सकता है?

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भारतीय राष्ट्रवाद की ख़ासियत यह है कि वह शुरुआत से ही उदारवादी रहा है | लेकिन आज के ध्रुवीकृत वातावरण में इन दोनों शब्दों को विरोधाभासी समझा जाने लगा है | कुछ राष्ट्र के स्वनियुक्त रक्षक लिबरल विचारधारा को ज़हरीला मानते है तो खुद को लिबरल मानने वाले राष्ट्रवाद नाम से ही कतरा जाते है |

तो हमने पुलियाबाज़ी की तक्षशिला इंस्टीटूशन के डायरेक्टर नितिन पई के साथ | नितिन लिबरल-राष्ट्रवाद पर कई लेख लिख चुके हैं | उनका मानना है कि सहिष्णुता और उदारवाद भारतीय राष्ट्रवाद के वह अभिन्न हिस्से है जिनकी वजह से भारत आज एक सशक्त देश बन पाया है |

इस पुलियाबाज़ी में हमने चर्चा की इन सवालों पर:
क़ौम क्या है? राष्ट्र, क़ौम, वतन, और देश - क्या यह सभी शब्द समानार्थक है?
अगर राष्ट्र महज़ एक वैचारिक संकल्पना है, तो क्या उसका महत्व कम हो जाता है?
राष्ट्रवाद क्या है? यह शब्द कलंकित क्यों हो गया?
भारतीय राष्ट्रवाद और हिन्दू राष्ट्रवाद में अंतर क्या है? भारतीय राष्ट्रवाद में क्या उदारवादी तत्व है?

The jingoistic, zero-sum version nationalism is back as a powerful, destructive force on the global stage. Yet a few thinkers believe that a tolerant, civic-minded variant of nationalism is a much better alternative than denouncing nationalism. So in this episode, we explore the liberal side of Indian nationalism with Nitin Pai, Director of the Takshashila Institution. Nitin argues that the nationalism we are overdosing ourselves with is not the inclusive one that created India, but the divisive one that created Pakistan and that those who attack pluralism in the name of nationalism are opening cracks and fissures in the carefully constructed edifice of India’s unity.

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Ep. 38: रन-नीति : क्रिकेट में डेटा क्रांति

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क्रिकेट एक ऐसा विषय है जिसमे हम सभी ज्ञानी है | लेकिन क्या आपको पता था कि डेटा साइंस के प्रयोग से क्रिकेट के स्तर में निरंतर सुधार आ रहा है ? डेटा एनालिसिस टीमों का एक अभिन्न अंग बन चुका है यहाँ तक कि इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड ने तो अब एक चीफ डेटा अफसर भी नियुक्त किया है | तो इस एपिसोड में हमने क्रिकेट के इस नए पहलू पर पुलियाबाज़ी की कार्तिक शशिधर से | कार्तिक एक मैनेजमेंट कंसलटेंट है, एक ब्लॉगर है, और क्रिकेट डेटा के एक शानदार न्यूज़लेटर Criconometrics के रचयिता भी है | इस एपिसोड में हमने क्रिकेट से जुड़े कई विषयों पर गहरी चर्चा की | जैसे कि:
सट्टे पर बैन लगने से कैसे मैच फिक्सिंग को बढ़ावा मिला ?
आईपीएल से क्रिकेट के स्तर में क्या बदलाव आए है ?
किस प्रकार डेटा का प्रयोग कर आईपीएल में मुंबई इंडियंस ने चेन्नई सुपर किंग्स के ख़िलाफ़ जयंत यादव को उतारा?
ODI मे औसतन स्कोर किस तरह से बदले है ?
अगले कुछ साल में क्रिकेट में क्या बदलाव अपेक्षित है?

Behind the scenes, data science is changing the way cricket gets played. Many teams now have data analysts in their dugouts who contribute to game strategies. In a sense, cricket is witnessing the Moneyball revolution that had a path breaking impact on Baseball. So in view of the 2019 ICC World Cup, we got together to discuss this role of data science and economics in cricket. Our guest is Karthik Shashidhar, a management consultant, uber-blogger, and an author. Karthik is also the creator of two newsletters: Criconometrics analyses cricket from the lens of data and analytics while The Art of Data Science talks about quant and business intelligence. In this wide-ranging puliyabaazi on cricket and cricketing skills, we discussed:

  • How making betting illegal leads to match fixing

  • How a discrete sport like cricket is primed for data analytics

  • How data analysis helped Mumbai Indians pick Jayant Yadav against Chennai Super Kings in the recently concluded IPL

  • Impact of T20 on the economics of cricket

  • How have average ODI scores increased over the last twenty years?

  • Why is India a cricketing powerhouse?

  • Can batsmen be classified into meaningful categories based on their style of gameplay?

  • How the fortune of leg-spin change in the last ten years of the game, and

  • What is in store for cricket in the next ten years?

    Also check out:

    Criconometrics, a newsletter that analyses cricket from the lens of data and analytics

  • The Art of Data Science, a newsletter about quant and business intelligence

  • Moneyball — The Art of Winning an Unfair Game

  • The Evolution of Cricket, ep 97 of The Seen and the Unseen

  • A way to analyse historical ODI games through data

  • Karthik’s YouTube channel with limited analysis of ODI and T20 games

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Ep. 37: ये लिबरल आख़िर है कौन?

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लिबरलिस्म अर्थात स्वातंत्रवाद आज एक विस्फोटक शब्द हो गया है | लेकिन ये लिबरल होने का आख़िर मतलब क्या होता है? इस प्रश्न का उत्तर खोजते हुए हम फ्रेडरिक हायेक (1899-1992) के लेख पढ़ने लगे | हायेक लिबरल विचारधारा की एक महत्वपूर्ण हस्ती है | The Use of Knowledge in Society, The Road to Serfdom और Law, Legislation, and Liberty हायेक के कुछ धमाकेदार लेख है जो आज भी बेहद प्रासंगिक है | उनकी पहली किताब के प्रकाशन को हाल ही ७५ साल हुए तो हमने सोचा उनके विचारों से हमारे श्रोताओं को अवगत कराया जाए |

लिबरल विचारधारा और हायेक की इन रचनाओं पर चर्चा करने के लिए हमारे साथ है अमित वर्मा | अमित एक लेखक और पॉडकास्टर है | अमित कई अखबारों में लिबरलिस्म, क्रिकेट, और राजनीति जैसे विषयों पर लिखते हैं | उनका अंग्रेजी पॉडकास्ट The Seen and The Unseen भारत के श्रेष्ठ पॉडकास्ट में से एक है |

Every “-ism” is built on a set of canonical ideas and influential personalities. And one such leading thinker behind the liberalism philosophy is Friedrich August Hayek (1899-1992). His landmark book The Road to Serfdom completed 75 years recently. This book was meant to warn readers that government regulation of our economic lives amounts to totalitarianism.

In another influential essay The Use of Knowledge in Society, Hayek writes that a centrally planned economy can never match the efficiency of the open market because what is known by a single agent is only a small fraction of the sum total of knowledge held by all members of society.

In this episode, Amit Varma joins us to discuss the relevance of Hayek’s key ideas in today’s India. Amit is a writer and commentator who won the Bastiat Prize for Journalism in 2007. Today, he is one of the few original thinkers on liberalism in India. He is known for his blog India Uncut and his podcast The Seen and The Unseen. He also edited the ThinkPragati magazine between 2016 and 2018.

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Ep. 36: ज़िन्दगी की चाबी

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कुछ ही महीनों पहले चीन के एक वैज्ञानिक ने जीनोम-एडिटिंग का उपयोग कर जुड़वां बच्चियाँ बनाकर पूरे जगत को हिला दिया | जीन एडिटिंग ने ‘कुदरत बनाम परवरिश’ विवाद को एक नया आयाम दे दिया है | तो इस बार पुलियाबाज़ी पर लेकर आए हैं हम एक वैज्ञानिक को जीन्स, जीन एडिटिंग बारे में विस्तार से चर्चा करने के लिए | हमारी गेस्ट है शांभवी नाईक, जो एक कैंसर बायोलॉजिस्ट हैं और तक्षशिला इंस्टीटूशन में रिसर्च फेलो हैं | हमने उनसे जीवशास्त्र से जुड़े कई सवालों पर चर्चा की:

जीन्स क्या होते हैं? उनका एक कोशिका में उपयोग क्या है? क्या जीन्स सच में ‘स्वार्थी’ होते हैं?
युजेनिक्स ने जीन शोध का किस प्रकार दुरुपयोग किया?
जीन एडिटिंग क्या है? इसके फायदे क्या हैं?
जीन एडिटिंग पर सरकारी नीतियाँ कैसे तय की जानी चाहिए?

Rapid advances in gene editing techniques have given a fresh impetus to the ‘nature vs nurture’ debate. So in the next edition of Puliyabaazi, we brought in a science policy researcher for an in-depth chat on genes, genetics, and the genetic revolution. Our guest is Shambhavi Naik, a Fellow at the Takshashila Institution. We discussed these topics and more in this episode:
What are genes? How do gene expression pathways work?
Can genes be linked to racial identity?
How has gene sequencing changed our understanding of heredity and human history?
What is gene editing and why is everyone talking about this? Is this the same as cloning?
Will gene editing lead to the same eugenics race we saw in the 1920-1940s? Will we have superhumans roaming on earth?
How should India govern gene editing?

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Ep. 35: ख़ुफ़िया बातें

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जासूसी एक ऐसा पेशा है जिसके बारे में न सिर्फ हम कम जानते है बल्कि अक़्सर सरासर ग़लत भी जानते है | फिल्मों में इस पेशे को इस तरह दर्शाया जाता है कि इंटेलिजेंस अफ़सर कई दिव्य शक्तियों के मालिक लगने लगते है | तो इस बार की पुलियाबाज़ी एक असली इंटेलिजेंस अफ़सर के साथ इस पेशे के बारे में | हमने बात की भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) के भूतपूर्व प्रमुख विक्रम सूद के साथ | यह चर्चा सूद जी की बेहतरीन किताब ‘The Unending Game: A Former R&AW Chief’s Insights into Espionage’ पर आधारित है | चर्चा में उठे कुछ सवाल:

  1. इंटेलिजेंस एजेंसी चार प्रकार के काम करती है - collection, analysis, dissemination, और operation| इन चारों को करने के लिए क्या ख़ूबियाँ चाहिए एक अफ़सर में?

  2. एक ख़ुफ़िया(covert) ऑपरेशन का मतलब क्या होता है? स्पेशल ऑपरेशन क्या होता है?

  3. भारत में ही नहीं पर पूरे विश्व में TECHINT की एक लहर आयी थी लेकिन अब CIA भी
    मानती है कि HUMINT को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता भले ही टेक्नोलॉजी कितनी ही अच्छी क्यों न हो जाए| ऐसा क्यों?

4."इंटेलिजेंस failure" होता क्या है?

  1. आज ख़ुफ़िया एजेंसियों का ध्यान आतंकवाद पर केंद्रित रहता है | इसका एक इंटेलिजेंस एजेंसी पर क्या असर पड़ता है?

  2. ३० साल बाद की इंटेलिजेंस एजेंसी को क्या क्या करना होगा?

  3. इंटेलिजेंस एजेंसियों में सुधार कहाँ से शुरू किया जाए?

Intelligence is one of the oldest professions known. Even the Arthashastra describes in detail the various methods of using spying as a tool of statecraft. And yet, enamoured by glorified portrayals of intelligence agencies on-screen, our knowledge about this discipline has many gaps. So in this episode we spoke to Mr Vikram Sood about the state of the profession today and the challenges faced by intelligence officers. Mr Sood headed India’s premier intelligence agency R&AW between 2000 and 2003. His book The Unending Game: A Former R&AW Chief’s Insights into Espionage is an excellent guide for understanding intelligence and espionage. During the course of this conversation, we discussed:

  1. How does the working of an external intelligence agency differ from that of an internal security service like IB, MI5 etc?

  2. What does the term ‘covert operation’ mean? How is a special operation different from a covert one?

  3. How important is the human element in the intelligence cycle? Can technology replace humans here?

  4. What is meant by an intelligence failure?

  5. What should be the essential elements of reforming intelligence agencies?

Listen in!

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Ep. 34: हमारी राजनीति आख़िर ऐसी क्यों है?

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2019 मतदान क़रीब है और राजनीति की हवा किस दिशा में बह रही है, इस पर हर भारतीय का अपना एक मत तो ज़रूर है| अक़्सर लोग कहते हैं कि भारत में राजनीति विचारधाराओं से परे है ; वह केवल नेताओं के व्यक्तित्व, भ्रष्टाचार, या फ़िर जातिगत समीकरण पर केंद्रित है | पर इन आम धारणाओं में कितना सच है, इसी विषय पर इस हफ़्ते की पुलियाबाज़ी राहुल वर्मा (फेलो, राहुल सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च) के साथ| राहुल और प्रदीप छिब्बर की नई किताब Ideology & Identity: The Changing Party Systems of India भारतीय राजनीति की संरचना पर एक गहन अध्ययन है |

राहुल से हमने इन सवालों पर पुलियाबाज़ी की:

भारतीय राजनीति की विचारधारा के स्तंभ क्या है?
स्वतंत्र होने से पहले क्या सोच थी सरकार के समाज में रोल के बारे में ? स्वतंत्र भारत में क्या कहानी रही है?
क्या वोट खरीदने से ही सरकारें बन जाती हैं?
क्या जाति सबसे बड़ा फैक्टर है हमारी राजनीति में?
नेताओं के व्यक्तित्व का क्या असर होता है वोटर पर?
एक और मान्यता है कि काडर (संगठन) वाली पार्टिया सफल होती है | कितना सच है इसमें?
२०१४ में जो नतीजा आया वह क्यों आया?

The 2019 elections are around the corner. Instead of adding to the chatter on electoral predictions, we present an in-depth chat with Rahul Verma (Fellow, Centre for Policy Research) on the structure of Indian politics. Rahul is the co-author of Ideology & Identity: The Changing Party Systems of India, a book that challenges common assumptions that Indian polity is chaotic, clientelistic, corrupt, and devoid of any ideology. Instead, they claim that the most important ideological debates in India are centred on statism-the extent to which the state should dominate and regulate society-and recognition-whether and how the state should accommodate various marginalised groups and protect minority rights from majorities.

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Ep. 33: बुंदेलखंड से उठती खबरों की एक लहर

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इस बार की पुलियाबाज़ी भारत के एकमात्र ग्रामीण, नारीवादी न्यूज़ चैनल - ख़बर लहरिया - के साथ | २००२ में स्थापित हुआ यह नेटवर्क अपनी बेबाक रिपोर्टिंग के लिए मशहूर है | तो हमने पुलियाबाज़ी की दिशा मलिक (मैनेजिंग डायरेक्टर) और कविता देवी (डिजिटल हेड) के साथ | पहले हमने बात की खबर लहरिया की सफलताएँ और चुनौतियाँ के बारे में | फ़िर हमने समझने की कोशिश की उत्तर प्रदेश के पिछड़े इलाक़े - बुंदेलखंड - को, ख़बर लहरिया के दृष्टिकोण से |

This episode of Puliyabaazi is on India’s only women-run rural media network - Khabar Lahariya. Employing women from Dalit, tribal, Muslim and backward castes, the network has won several national and global awards for their pioneering rural journalism. We spoke to Disha Mullick, Managing Director and Kavita Devi, Digital Head from the Khabar Lahariya team about:
How did Khabar Lahariya start? What have been some stages in KL’s development since it came into being in 2002?
What challenges do KL’s women reporters face while investigating issues in a patriarchal society?
How is rural Bundelkhand like? What are some changes that KL has noticed in governance over the years?

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Ep. 32: IL&FS से DHFL तक - क्यों लड़खड़ा रहे हैं NBFC?

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भारत में तक़रीबन 90 बैंक है पर 10000 ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कम्पनियाँ (NBFC) हैं जबकि दोनों संस्थाओं का एक ही रोल है - किफ़ायती क़र्ज़ उपलब्ध करा पाना | कोबरापोस्ट वेबसाइट ने इनमें से एक - DHFL - पर जनवरी में आरोप लगाया था कि इस कम्पनी ने 31 हजार करोड़ रुपए का घोटाला किया है! इसे ‘भारत के इतिहास का सबसे बड़ा बैंकिंग स्कैम’ करार दिया गया था।भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में NBFC पर नियंत्रण कैसे हो यह एक ज्वलंत विषय है | तो इस एपिसोड में हमने कोशिश की समझने की यह NBFC बला क्या है? इस विषय पर पुलियाबाज़ी के लिए हमारे साथ है दो विशेषज्ञ - हर्ष वर्धन और नारायण रामचंद्रन | हर्ष एसपी जैन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च (SPJIMR) में फेलो है | नारायण एक इन्वेस्टर, लेखक, और तक्षशिला इंस्टीटूशन में सीनियर फेलो हैं | इससे पहले नारायण मॉर्गन स्टैनली इंडिया के प्रमुख और RBL बैंक के ग़ैर-कार्यकारी अध्यक्ष रह चुके है | इस विषय पर पढ़िए हर्ष के विचार ब्लूमबर्गक्विंट पर और नारायण का लेख मिंट अखबार में|

इस पुलियाबाज़ी में हमने उनके सामने यह सवाल रखे:
ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी मतलब NBFC क्या होती है?
NBFC और मिक्रोफिनांस संस्थाओं में क्या अंतर है?
इस तरह की कम्पनियों का भारत में फैलाव कैसा रहा है?
क्या यह फैलाव दुसरे देशों के समरूप रहा है या फिर भारत की अर्थव्यवस्था में NBFC का प्रचलन ज़्यादा/कम है? और ऐसा क्यों?
IL&FS कर्ज पर ब्याज की किश्त चुकाने में असमर्थ रही है। क्या इस वाक़िये से NBFC पर कुछ फर्क पड़ा है?
NBFC पर रेगुलेशन में हम कोताई बरत रहे है | तो क्या ग़लत है और उसे ठीक कैसे किया जाए?

Soon after IL&FS scam in October 2018 comes another one in January 2019 - the DHFL scam. Terming this as India’s biggest ever banking scam, investigative website Cobrapost alleged a misuse of an astronomical sum of 31,000 crores. Both these companies are classified as Non-Banking Financial Companies (NBFCs). So in this episode, we return to a core issue in the Indian economy - why are they falling apart and how to regulate such institutions. And why do we even need NBFCs in our economy. Harsh Vardhan (Fellow at the Centre for Financial Services, SPJIMR) and Narayan Ramachandran (Senior Fellow, Takshashila Institution) join us as guests for a puliyabaazi on this issue.

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Ep. 31: स्वतंत्र भारत में मतदान की कहानियाँ

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2019 के लोकसभा चुनाव नज़दीक आ रहे है | अगले कुछ महीनों में हर नुक्कड़-गली में “कौन बनेगा प्रधानमंत्री” इसी विषय पर वाद-विवाद होगा | तो पुलियाबाज़ी में हमने इस प्रश्न से हटकर मतदान प्रक्रिया को समझने का प्रयास किया | इस पुलियाबाज़ी में हमारे गेस्ट है श्री अलोक शुक्ला जो २००९ और २०१४ के बीच भारत के डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर रह चुके हैं | उनकी नयी किताब Electronic Voting Machines: The True Story इवीएम पर लग रही आलोचनाओं का मुँहतोड़ जवाब देती है | इस पुलियाबाज़ी में हमने उनके सामने यह सवाल रखे:

  1. संसद चुनाव के लिए प्रक्रिया कब और कैसे शुरू होती है ?

  2. चुनाव आयोग एक स्वतन्त्र संवैधानिक संस्था है - इस संरचना का ECI अफसरों पर आपके मुताबिक क्या फ़र्क पड़ता है? क्या सब पार्टियाँ चुनाव आयोग के पास चुगली करने आती रहती है?

  3. EVM के आने से पहले क्या तकलीफें होती थी चुनाव करवाने में ?

  4. EVM का आईडिया कब पहले आया? क्या क्या विरोध रहे है EVM के ख़िलाफ़?

  5. EVM और राजनैतिक दलों का रिश्ता कैसा रहा है?

  6. EVM की छवि सुधारने के लिए ECI को क्या करना चाहिए?

In the 1971 General Elections, it was alleged that ballot papers were tampered using vanishing and reappearing ink such that the vote stamp miraculously disappeared from another candidate and reappeared against the Congress candidate instead. This is not different from today when political parties blame the Electronic Voting Machine for their losses. So in this episode, we investigate the Indian electoral process and the EVM itself. To help us understand this better, we are joined by Dr Alok Shukla who served as Deputy Election Commissioner between 2009 and 2014. Dr Shukla has served as an international observer for elections in several countries and has been decorated with the Prime Minister’s Award for Excellence in Administration in 2010. His latest book Electronic Voting Machines: The True Story is an authoritative account on electronic voting machines.

सुनिए और बताइये कैसा लगा यह एपिसोड आपको और निश्चिंत होकर अपने उम्मीदवार को चुनिए २०१९ लोकसभा मतदान में |

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Ep. 30: लश्कर-ए-तय्यबा: कब, क्यूँ, और कैसे

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26 नवंबर 2008 , मुंबई की दर्दनाक तस्वीरें आज भी दिल दहला देती हैं | इस हमले को अंजाम दिया था पाकिस्तान सेना के पसंदीदा आतंकवादी गुट - लश्कर-ए-तैयबा ने | इस हादसे के 11 साल बाद भी, हम कम ही जानते है कि यह संगठन शुरू कैसे हुआ, किस मक़सद से हुआ, और इसके हथकंडे क्या है | तो हमने की पुलियाबाज़ी प्रॉफ़ेसर क्रिस्टीन फेयर से, जिन्होंने हाल ही में इस संगठन पर एक किताब ‘In Their Own Words: Understanding the Lashkar-e-Tayyaba’ लिखी है | फेयर जार्जटाउन यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रॉफेसर है और पाकिस्तान सेना पर किये गए अपने उल्लेखनीय शोधकार्य के लिए जानी जाती है | उनसे हमने इस आतंकवादी गुट एक संगठन के रूप में समझने के लिए यह सवाल सामने रखे:

In this episode, we explore one of the most important nodes of the Pakistani military-jihadi complex: the Lashkar-e-Tayyaba (LeT). Our guest for this episode is Prof Christine Fair, a renowned voice on Pakistan security issues. In her latest book In Their Own Words: Understanding the Lashkar-e-Tayyaba, Dr Fair reveals finer details about LeT using publications produced and disseminated by Dar-ul-Andlus, the publishing wing of LeT.

In this Puliyabaazi, we investigate LeT using organisation theory. What are their vision and mission statements? What keeps them together? How do they recruit employees? Who are their shareholders? And finally, what will it take to end this organisation? Listen in for an in-depth discussion on these questions.

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Ep. 29: अम्बेडकर के जातिप्रथा पर विचार: भाग २

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पूरे भारत ने अपना सत्तरवाँ गणतंत्र दिवस पिछले हफ़्ते मनाया और अंबेडकर के योगदान को फिर एक बार याद किया | पर अंबेडकर साहब जैसे बुद्धिजीवी को सम्मान देने का शायद सबसे प्रभावशाली तरीका है उनके विचारों को समझना | अब उनको पुलियाबाज़ी में ला पाना तो संभव नहीं है इसलिए इस बार हमने प्रयत्न किया उनके कुछ लेख पढ़ने का और उनके तर्क को आपके सामने रखने का | इस दो भाग स्पेशल में हमने विश्लेषण किया अंबेडकर के जातिप्रथा पर कुछ विचारों का |

भाग 2 में में सुनिए चर्चा उनके सबसे प्रसिद्ध लेख - Annihilation of Caste - पर | अंबेडकर ने यह भाषण 1936 में लाहौर के जात-पात तोड़क मंडल के लिए तैयार किया था पर यह लेख इतना धमाकेदार था कि मंडल ने इसे प्रकाशित करने से मना कर दिया | अंत में अंबेडकर ने खुद इसे प्रकाशित किया | जातिप्रथा का उन्मूलन क्यूँ और कैसे किया जाए - यह लेख इन सवालों पर केंद्रित है | यह लेख इतना प्रसिद्ध हुआ कि गांधीजी ने भी इस पर अपने विचार रखे और अपनी असहमति के कारण समझाए | इस एपिसोड में हमने इस बेहद ज़रूरी वाद-विवाद पर चर्चा की है | सुनिए और बताइए कैसा लगा आपको|

साथ ही इस सीरीज़ के भाग १ में हमारी चर्चा सुनिए उनकी किताब The Untouchables पर |

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Ep. 28: अम्बेडकर के जातिप्रथा पर विचार: भाग १

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गणतंत्र दिवस के अवसर पर हम भीमराव अम्बेडकर के योगदान को अक़्सर सलामी देते हैं | पर अम्बेडकर साहब जैसे बुद्धिजीवी को सम्मान देने का शायद सबसे प्रभावशाली तरीका है उनके विचारों को समझना| अब उनको पुलियाबाज़ी में ला पाना तो संभव नहीं है इसलिए इस बार हमने प्रयत्न किया उनके कुछ लेख पढ़ने का और उनके तर्क को आपके सामने रखने का | इस दो भाग स्पेशल में हमने विश्लेषण किया अम्बेडकर के जातिप्रथा पर कुछ विचारों का | भाग १ में सुनिए चर्चा उनकी किताब The Untouchables  पर | भाग २ में सुनिए चर्चा Annihilation of Caste पर | अम्बेडकर के काफ़ी लेख विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर आसानी से उपलब्ध है | पढ़िए और अपने विचार ज़रूर शेयर कीजिये हमारे साथ |